हरित चेतना की विरासत और आज की आवश्यकता, श्री गुरु हर राय जी की दृष्टि से पर्यावरणीय पुनर्जागरण
✍️लेखक: सुनील दत्त, पूर्व डायरेक्टर, पंजाबी साहित्य अकादमी
जब विश्व जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता के ह्रास और जल-संकट जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब केवल वैज्ञानिक या तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं। हमें एक नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि की भी आवश्यकता है, जो मनुष्य और प्रकृति के संबंध को पुनर्स्थापित कर सके। सिख परंपरा में यह दृष्टि सात वें गुरु, श्री गुरु हर राय जी के जीवन और कार्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। उन्होंने प्रकृति को केवल उपयोग की वस्तुन हीं, बल्कि ईश्वर की रचना और मानव की साझा जिम्मेदारी के रूप में देखा।
सिख धर्म का मूल ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब प्रकृति को उच्च सम्मान देता है। “पवन गुरु, पानी पिता, माता धरत महत” जैसी वाणी मनुष्य को यह स्मरण कराती है कि वायु, जल और धरती हमारे अस्तित्व के आधार हैं। जब धरती को माता और जल को पिता कहा जाता है, तो यह केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि गहरा नैतिक संदेश है कि इन तत्वों का शोषण नहीं, संरक्षण हमारा कर्तव्य है।
श्री गुरु हर राय जी ने इस सिद्धांत को व्यवहार में उतारा। कीरतपुर साहिब में उन्होंने एक विशाल औषधीय उद्यान स्थापित कराया, जहाँ दुर्लभ जड़ी-बूटियों और पौधों का संरक्षण किया जाता था। यह उद्यान केवल सौंदर्य के लिए नहीं था, बल्कि प्राकृतिक चिकित्सा और जनसेवा का केंद्र था। रोगियों के उपचार के लिए इन औषधियों का उपयोग किया जाता था। इस प्रकार उन्होंने प्रकृति-संरक्षण को मानव-सेवा से जोड़ा।
उनकी प्रेरणा से आज अनेक सिख संस्थाएँ पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में सक्रिय हैं। ग्रीन गुरुद्वारा की अवधारणा के अंतर्गत सौर ऊर्जा का उपयोग, वर्षाजल संचयन, प्लास्टिक-मुक्त लंगर और कचरा प्रबंधन जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। वृक्षारोपण अभियान, स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और सामुदायिक वन निर्माण की पहलें भी चल रही हैं।
वर्तमान समय की आवश्यकता यह है कि पर्यावरण संरक्षण को केवल सरकारी नीति न समझा जाए, बल्कि सामाजिक और आध्यात्मिक आंदोलन बनाया जाए। प्रत्येक परिवार अपने स्तर पर जल संरक्षण, वृक्षारोपण और सादगीपूर्ण जीवन को अपनाए। श्री गुरु हर राय जी की हरित चेतना हमें यही याद दिलाती है कि धर्म और धरती अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।

