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पाकिस्तान: एक देश या एक फौज की छावनी?

पाकिस्तान: एक देश या एक फौज की छावनी?

भारतीय मीडिया को पाकिस्तान की जगह “पाकिस्तान कैंट” (छावनी) शब्द का प्रयोग करना चाहिए

पाकिस्तान एक ऐसा देश है, जहां सैन्य और खुफिया एजेंसियां, विशेष रूप से पाकिस्तानी सेना और आईएसआई, देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव डालती हैं। यह प्रभाव इतना अधिक है कि अक्सर यह कहा जाता है कि पाकिस्तान एक देश नहीं, बल्कि एक सेना की छावनी है।

पाकिस्तान: एक देश या एक फौज की छावनी?

सैन्य और राजनीतिक प्रभाव

पाकिस्तान के राजनीतिक परिदृश्य में सेना और आईएसआई की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण रही है। देश के इतिहास में कई बार सैन्य तख्तापलट हुए हैं, जिनमें सेना ने सीधे तौर पर सरकारों को उखाड़ फेंका है और खुद शासन संभाला है। उदाहरण के लिए, 1958 में जनरल अयूब खान, 1977 में जनरल जिया-उल-हक, और 1999 में जनरल परवेज मुशर्रफ ने तख्तापलट कर सत्ता हासिल की थी।

आर्थिक प्रभाव

पाकिस्तानी सेना का आर्थिक प्रभाव भी बहुत गहरा है। सेना के पास कई व्यावसायिक उपक्रम हैं, जैसे कि सेना के रिटायर्ड अधिकारियों द्वारा संचालित व्यवसाय और सेना के स्वामित्व वाले औद्योगिक घराने। उदाहरण के लिए, सेना की अपनी कंपनियां हैं जो रियल एस्टेट, निर्माण, और अन्य क्षेत्रों में काम करती हैं।

पाकिस्तान: एक देश या एक फौज की छावनी?

आईएसआई की भूमिका

आईएसआई, जो पाकिस्तान की प्रमुख खुफिया एजेंसी है, का भी देश के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य पर गहरा प्रभाव है। आईएसआई को अक्सर राजनीतिक हस्तियों की गतिविधियों पर निगरानी रखने तथा उन्हें प्रभावित करने के लिए जाना जाता है। 

पाकिस्तान: एक देश या एक फौज की छावनी?

यह एजेंसी आतंकवादी समूहों के साथ भी जुड़ी रही है और इसका उपयोग पाकिस्तान की विदेश नीति के साधन के रूप में किया जाता रहा है।

आम जनता और नेताओं पर प्रभाव

आम जनता और नागरिक नेता अक्सर सेना और आईएसआई के प्रभाव के सामने झुकने को मजबूर होते हैं। सेना और आईएसआई की शक्ति इतनी अधिक है कि उनके खिलाफ बोलना या काम करना बहुत जोखिम भरा हो सकता है। कई बार विपक्षी नेताओं और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार किया गया है या उन्हें धमकाया गया है जब उन्होंने सेना की नीतियों या कार्यों की आलोचना की है।

पाकिस्तान: एक देश या एक फौज की छावनी?

पाकिस्तान में सेना और आईएसआई का प्रभाव इतना अधिक है कि यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि यह एक देश नहीं, बल्कि एक सेना की छावनी है। सेना और खुफिया एजेंसियाँ न केवल राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन में भी गहराई से शामिल हैं। भारतीय मीडिया को पाकिस्तान की जगह “पाकिस्तान कैंट” (छावनी) शब्द का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि वहां अवाम या अवाम से जुड़े नेताओं, व्यापारियों इत्यादि का कोई वजूद ही नहीं है।

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