ईरान और पर्शियन देशों में सूर्य की उपासना का मनाया जाता है उत्सव
✍️ Lieutenant. Preeti Mohan
मकर संक्रांति और ईरानी-पार्सी समाज में मनाया जाने वाला “याल्दा” उत्सव, दोनों ही सांस्कृतिक परंपराओं के मध्य एक मौजूदा सामंजस्यिक संबंध का प्रतीक है। इन दोनों का मूल सनातन में होना और सूर्य की पूजा से जुड़ा होना इन उत्सवों को एक दूसरे से जोड़ता है।
मकर संक्रांति:
मकर संक्रांति, जो भारतीय हिंदू धर्म में मनाया जाता है, वर्ष के पहले महीने में होने वाला एक महत्वपूर्ण उत्सव है। इस दिन सूर्य देवता की पूजा की जाती है और लोग मकर संक्रांति के दिन गंगा स्नान करते हैं। यह उत्सव भारत के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग नामों से मनाया जाता है, जैसे मकर संक्रांति, पोंगल, लोहड़ी, उत्तरायण, मघ बिहू आदि। इस उत्सव के दौरान लोग धान की खील खेलते हैं, खिचड़ी बनाते हैं और खाते हैं, और उड़ी बनाकर उसे खुदाई करते हैं। यह उत्सव लोगों के बीच एकता और खुशी का संकेत है और उन्हें नए साल की शुरुआत के रूप में मनाने का अवसर देता है।
याल्दा उत्सव:
ईरान और पार्सी समाज में “शब-ए-याल्दा” (जन्म की रात्रि) अथवा जायेशमेहर (सूर्य का जन्म) उत्सव का आयोजन, सूर्य की पूजा के साथ होता है और इसे साल के सबसे लम्बे रात के रूप में जाना जाता है। जो वर्ष की सबसे लंबी रात्रि 21/22 दिसंबर को मनाया जाता है और अगले दिन सूर्य को नवजात मानकर स्वागत करते हैं। इस उत्सव के दौरान, लोग अपने परिवार और दोस्तों के साथ मिलकर खानपान करते हैं और खुशी के पलों का आनंद लेते हैं। इसके साथ ही, सूर्य के उत्साही रूप की पूजा की जाती है जिससे दुनिया में प्रकाश और ऊर्जा का प्रतीक मिलता है। याल्दा उत्सव एक परिवारिक उत्सव है जो लोगों को एक साथ लाता है और उन्हें आपसी बंधनों का महत्व याद दिलाता है।
संबंध और अद्भुतता:
याल्दा और मकर संक्रांति, दोनों ही अपने-अपने समाजों में सूर्य की महत्ता और ऊर्जा के प्रति आभास को प्रतिष्ठित करते हैं। सूर्य न केवल जीवन का स्त्रोत है बल्कि यह भी ज्ञान, उजागरता, और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है। इन उत्सवों के माध्यम से लोग एक नए आराध्य दृष्टिकोण में सूर्य की अनमोलता को समझते हैं और उसके साथ अपनी शक्ति और संबंध को मजबूत करते हैं। ये उत्सव लोगों को संयम, आनंद और एकता की भावना से जोड़ते हैं और उन्हें सूर्य की शक्ति और प्रकाश का महत्व समझाते हैं।
इस प्रकार, याल्दा और मकर संक्रांति, दोनों ही सांस्कृतिक समृद्धि के माध्यम से लोगों को एक-दूसरे के साथ जोड़ते हैं और सूर्य की पूजा के माध्यम से एक नए सवेरे की प्रतीक्षा में रात्रि को विदा करते हैं।
.jpg)