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लल दद्द – कश्मीर की साझी विरासत और इंटरफेथ की जीवंत मिसाल

14वीं शताब्दी की महान संत-कवयित्री लल दद्द (लल्लेश्वरी / ललारिफा), जिन्हें ‘कश्मीर की मीरा’ भी कहा जाता है, का जीवन आज धर्मों के बीच बढ़ती दूरियों को मिटाने का सबसे बड़ा जरिया है:

कश्मीर की धरती ने हमेशा से प्रेम, सहिष्णुता और आध्यात्मिकता की मिसालें दी हैं। इसी साझी विरासत और समावेशी संस्कृति की सबसे बड़ी प्रतीक 14वीं शताब्दी की महान संत कवयित्री लल दद्द हैं। कश्मीर के जनमानस में रची-बसी इस महान विभूति को लल्लेश्वरी, लला, ललारिफा, और ‘कश्मीर की मीरा’ या ‘कश्मीर की राबिया’ जैसे अनेक आदरसूचक नामों से जाना जाता है। आज जब समाज में धर्मों के बीच दूरी बढ़ने की बात होती है, तो लल दद्द का जीवन और वचन हमें “बैन-उल-मज़ाहिब” यानी इंटरफेथ की राह दिखाते हैं।

शुरुआती जीवन और आध्यात्मिक यात्रा
लल दद्द का जन्म 14वीं शताब्दी में कश्मीर के पाम्पोर के निकट एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। कम उम्र में ही उनका विवाह कर दिया गया, जहाँ उन्हें अपनी सास और पति से घोर प्रताड़ना व यातनाएं सहनी पड़ीं। किवदंतियों के अनुसार, उनकी सास उनके खाने की थाली में भात के नीचे पत्थर छिपा कर रख देती थीं (जिससे ‘ललि नीलवठ चलि न जांह’ कहावत बनी)। लेकिन इन सांसारिक और पारिवारिक बंधनों ने उनके भीतर की आध्यात्मिक प्यास को बुझने नहीं दिया। उन्होंने गृहस्थी का त्याग कर दिया और आत्म-ज्ञान तथा उस ‘परम शिव’ की तलाश में संन्यासिनी बनकर एकांत और योग का मार्ग अपना लिया।

लल दद्द ने अपने वचनों (जिन्हें ‘वाख’ कहा जाता है) के माध्यम से तत्कालीन समाज में व्याप्त कुरीतियों, धार्मिक पाखंडों, जाति-प्रथा और बाहरी आडंबरों पर गहरी चोट की। उन्होंने संदेश दिया कि ईश्वर को मंदिरों/मस्जिद या तीर्थों में खोजने के बजाय अपने भीतर (अंतर्मन में) खोजना चाहिए। उनकी इस खोज को इस वाख में समझा जा सकता है:

“शिव चुई थलि थलि रोज़े, न ज़ानि म्योनि क्याह गव”
अर्थ: शिव तो कण-कण में बसता है, मैं नादान उसे कहाँ-कहाँ नहीं ढूंढती रही।

हिन्दू-सूफी संगम
लल दद्द का जीवन और उनका दर्शन कश्मीर में ‘हिन्दू-सूफी संगम’ का एक अनूठा और उत्कृष्ट उदाहरण है। यद्यपि लल दद्द का जन्म कश्मीरी शैव परंपरा में हुआ था, लेकिन उनके वचनों (वाख) में सूफी तसव्वुफ की भी अथाह गहराई मिलती है। उन्होंने अद्वैत और एकेश्वरवाद पर बल देते हुए कहा कि हम सब एक ही ज्योति (नूर) की संतान हैं। उनके इस दर्शन की झलक इस वाख में मिलती है:

“एक नूरस पे सब जग बुन्यो, कुस म्योनि कुस कोर”
अर्थ: एक ही प्रकाश से सारा संसार बना है, फिर कौन अच्छा और कौन बुरा?

उनके इसी सरल और आडंबर-रहित स्वभाव के कारण तत्कालीन सूफी संतों ने भी उन्हें अत्यंत आदर दिया। यह माना जाता है कि लल दद्द की भेंट प्रसिद्ध सूफी संत मीर सैयद अली हमदानी से हुई थी, जिन्हें देखकर उन्होंने कहा था कि आज उन्हें एक सच्चे ‘पुरुष’ के दर्शन हुए हैं। इसके अलावा, कश्मीर के प्रसिद्ध सूफी संत शेख नूरुद्दीन वली (नुन्द ऋषि) के साथ भी उनका गहरा नाता रहा है। किवदंतियों के अनुसार, जब जन्म के बाद नुन्द ऋषि ने अपनी माँ का दूध नहीं पिया था, तब लल दद्द ने ही उन्हें अपना दूध पिलाकर सांसारिक जीवन से परिचित कराया था।

लल दद्द की यह दृष्टि ही थी जिसने उन्हें इस्लाम और सनातन धर्म के बीच एक मजबूत सेतु बना दिया। आज भी वे हिन्दुओं में ‘लल्लेश्वरी’ और मुसलमानों में ‘ललारिफा’ के रूप में समान रूप से प्रतापित और पूजनीय हैं। बिजबेहरा स्थित लल दद्द का आश्रम इस ‘इंटरफेथ’ और साझी संस्कृति का एक जीवंत प्रमाण है, जहाँ दोनों ही समुदायों के लोग पूरे आदर के साथ माथा टेकते हैं। यही सोच कुरान के “दीन-ए-कय्यिम” और सनातन की “सनातन सत्य” की अवधारणा से मिलती है। यहीं से लल दद्द इस्लाम और सनातन धर्म के बीच सेतु बन जाती हैं।

आज के समय में प्रासंगिकता
आज के दौर में जब समाज में धर्मों के बीच दूरियां बढ़ती हुई दिखाई देती हैं, तब लल दद्द के ‘बैन-उल-मज़ाहिब’ यानी इंटरफेथ (Interfaith) के संदेश की अहमियत सबसे अधिक हो जाती है। लल दद्द ने 700 साल पहले जो कहा, वह आज दक्षिण एशिया के लिए और भी जरूरी है। उन्होंने धर्म के नाम पर बंटवारे को नकारा और इंसानियत को सबसे ऊपर रखा।

उन्होंने हमेशा यही सिखाया कि जब मनुष्य स्वयं को जान लेता है, तो उसके भीतर से भेदभाव और घृणा समाप्त हो जाते हैं। इस गहन सत्य को उनके इस प्रसिद्ध वाख में देखा जा सकता है: “आत्म पानय तम्यो, परमेश्वर चुखु न ब्योअर्थ:* जब मैंने अपनी आत्मा को पहचाना तो मुझे परमेश्वर के सिवा दूसरा कोई दिखाई ही नहीं दिया। उनके ये वचन नफरत के दौर में समाज को प्रेम और इंसानियत का अमूल्य पाठ पढ़ाते हैं।

लल दद्द केवल एक संत नहीं थीं, बल्कि एक सामाजिक और आध्यात्मिक आंदोलन थीं। उन्होंने अपनी रचनाएँ तत्कालीन क्लिष्ट भाषा (संस्कृत) के बजाय आम जन की ‘कश्मीरी’ भाषा में रचीं, जिसके चलते वे सीधे आम लोगों के दिलों में उतर गईं। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम लल दद्द के वचनों और इस ‘एक नूर’ वाले प्रेम व इंसानियत के फलसफे को घर-घर तक पहुंचाएं। जब तक लल्लेश्वरी की यह समावेशी साझी विरासत जिंदा रहेगी, तब तक कश्मीर और पूरा दक्षिण एशिया आपसी भाईचारे और शांति के साथ जी सकेगा। रहेगी, तब तक कश्मीर और पूरा दक्षिण एशिया आपसी भाईचारे और शांति के साथ जी सकेंगे।

लेखक: सुनील दत्त

पूर्व निदेशक, पंजाबी साहित्य अकादमी

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