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गणतंत्र दिवस के मौके पर कश्मीर घाटी में बहुआयामी संस्कृति की नई शुरुआत

गणतंत्र दिवस के मौके पर कश्मीर घाटी में बहुआयामी संस्कृति की नई शुरुआत

✍️Lieutenant. Preeti Mohan

कश्मीर घाटी के कुपवाड़ा जिले में गणतंत्र दिवस के मोके पर पहली बार घाटी की बहुआयामी संस्कृति की झलक देखने को मिली। आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर हिन्दको बोली में एक गीत प्रस्तुत किया गया। 

कुपवाड़ा के करनाहा और टंगधार क्षेत्रों में लगभग छह लाख लोग हिन्दको बोली बोलते हैं, जो कि पंजाबी भाषा की एक उपबोली मानी जाती है। इसी कारण यहाँ के लोग पंजाबी क्लासिक लोक विधाओं जैसे माहिये, टप्पे और हीर-रांझा को अत्यंत मनमोहक शैली में प्रस्तुत करते हैं।

कृष्ण गंगा नदी के तट पर बसा यह इलाका अब बॉर्डर टूरिज्म के लिए पंजाब के लोगों की पहली पसंद बनता जा रहा है। यहाँ के स्थानीय लोग सीमा क्षेत्र में आने वाले पर्यटकों को हिन्दको लोक संगीत और संस्कृति से प्रभावित कर रहे हैं। पंजाब से आने वाले लोग जब यहाँ अपनी ही बोली से मिलती-जुलती भाषा सुनते हैं, तो उन्हें गहरा रोमांच और गौरव की अनुभूति होती है। कश्मीर घाटी में पहली बार गणतंत्र दिवस से घाटी की बहुआयामी भाषाओं और संस्कृतियों के कार्यकर्मों की आकर्षक शुरुआत हुई।

हिन्दको, पोठोहारी, गोजरी, पश्तो, शीना और हुंजा बोली बोलने वाले लगभग तीस लाख लोग (जबकि घाटी की कुल आबादी लगभग 75 लाख है) आज भी अपनी समृद्ध संस्कृति, रीति-रिवाज और संगीत के लिए भारत के अन्य राज्यों के पर्यटकों और शोधकर्ताओं के बीच पर्याप्त रूप से परिचित नहीं हैं।

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