22 फरवरी 2023
**** स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती ****
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| स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती |
स्वामी श्रद्धानन्द सरस्वती भारत के शिक्षाविद, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी तथा आर्यसमाज के संन्यासी थे जिन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती की शिक्षाओं का प्रसार किया. वे भारत के उन महान राष्ट्रभक्त सन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना जीवन स्वाधीनता, स्वराज्य, शिक्षा तथा वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था.
उन्होंने गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय आदि शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की और हिन्दू समाज व भारत को संगठित करने तथा 1920 के दशक में शुद्धि आन्दोलन चलाने में महती भूमिका अदा की. डॉ भीमराव आम्बेडकर ने सन 1922 में कहा था कि श्रद्धानन्द अछूतों के “महानतम और सबसे सच्चे हितैषी” हैं.
स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म 22 फरवरी सन् 1856 (फाल्गुन कृष्ण त्र्योदशी, विक्रम संवत् 1913) को पंजाब प्रान्त के जालन्धर जिले के तलवान ग्राम में एक खत्री परिवार में हुआ था. उनके पिता श्री नानकचन्द विज ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित यूनाइटेड प्रोविन्स (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी थे. उनके बचपन का नाम बृहस्पति विज और मुंशीराम विज था, किन्तु मुन्शीराम सरल होने के कारण अधिक प्रचलित हुआ.
पिता का स्थानान्तरण अलग-अलग स्थानों पर होने के कारण उनकी आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार नहीं हो सकी. लाहौर और जालंधर उनके मुख्य कार्यस्थल रहे.
एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक-धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे. पुलिस अधिकारी नानकचन्द विज अपने पुत्र मुंशीराम विज को साथ लेकर स्वामी दयानन्द सरस्वती जी का प्रवचन सुनने पहुँचे. युवावस्था तक मुंशीराम विज ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे. लेकिन स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम विज को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया.
वे एक सफल वकील बने तथा काफी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की. वकालत के साथ आर्य समाज जालंधर के जिला-अध्यक्ष के पद से उनका सार्वजनिक जीवन प्रारम्भ हुआ. आर्य समाज में वे बहुत ही सक्रिय रहते थे. महर्षि दयानन्द के महाप्रयाण के बाद उन्होने स्वयं को स्व-देश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा, स्व-शिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, स्वदेशी प्रचार, वेदोत्थान, अन्धविश्वास-उन्मूलन, पाखण्ड खण्डन और धर्मोत्थान के कार्यों को आगे बढ़ाने में पूर्णतः समर्पित कर दिया.
गुरुकुल कांगड़ी की स्थापना, शुद्धि अछूतोद्धार, सद्धर्म प्रचार, पत्रिका द्वारा धर्म प्रचार, सत्य धर्म के आधार पर साहित्य रचना, वेद पढ़ने व पढ़ाने की व्यवस्था करना, धर्म के पथ पर अडिग रहना, आर्य भाषा के प्रचार तथा उसे जीवीकोपार्जन की भाषा बनाने का सफल प्रयास, आर्य जाति के उन्नति के लिए हर प्रकार से प्रयास करना आदि ऐसे कार्य हैं जिनके फलस्वरुप स्वामी श्रद्धानन्द अनन्त काल के लिए अमर हो गए.
23 दिसम्बर, सन् 1926 को एक अब्दुल रशीद नाम के एक उन्मादी ने उनकी हत्या कर दी.
उनका विवाह श्रीमती शिवा देवी के साथ हुआ था. जब आप 35 वर्ष के थे तभी शिवा देवी स्वर्ग सिधारीं. उस समय उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं. इन्द्र विद्यावाचस्पति उनके ही पुत्र थे. सन् 1917 में उन्होने सन्यास धारण कर लिया और स्वामी श्रद्धानन्द के नाम से विख्यात हुए. ऐसे महान क्रान्तिकारी, तेजस्वी, ओजस्वी एवं समाजसेवी स्वामी श्रद्धानन्द जी की जयन्ती पर शत्-शत्-नमन् 🙏
