बाबा बंदा सिंह बहादुर

✍️लेखक: Er. VD Virdi
बाबा बंदा सिंह बहादुर भारतीय इतिहास के एक ऐसे जाज्वल्यमान नक्षत्र हैं, जिनकी जीवनगाथा अन्याय के विरुद्ध संघर्ष, अटूट धार्मिक निष्ठा और सामाजिक न्याय की स्थापना का एक अद्वितीय संगम है। उनका उदय 18वीं शताब्दी के उस अंधकारमय समय में हुआ जब मुगल साम्राज्य का दमन अपने चरम पर था। एक वैरागी साधु से एक अजेय सेनापति बनने तक की उनकी यात्रा न केवल व्यक्तिगत रूपांतरण की कहानी है, बल्कि यह पंजाब की धरती पर एक नई राजनीतिक चेतना के जन्म का प्रतीक भी है।
I. प्रारंभिक जीवन और सांसारिक विरक्ति: लछमण दास का रूपांतरण
बाबा बंदा सिंह बहादुर का जन्म 27 अक्टूबर, 1670 (16 अक्टूबर, 1670 ई.) को जम्मू और कश्मीर के राजौरी (जिला पुंछ) में हुआ था। उनके पिता का नाम श्री रामदेव था, जो भारद्वाज गोत्र के एक राजपूत किसान थे। बचपन में उनका नाम लछमण दास (या लछमण देव) रखा गया था। एक राजपूत परिवार में जन्म लेने के कारण उनमें जन्मजात वीरता थी और वे शस्त्र संचालन, विशेषकर निशानेबाजी और शिकार में अत्यंत निपुण थे।
उनके जीवन की दिशा बदलने वाली घटना एक शिकार अभियान के दौरान घटी। लछमण दास ने एक गर्भवती हिरणी पर तीर चलाया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अपनी आँखों के सामने उस तड़पती हिरणी और उसके दो अजन्मे बच्चों को निष्प्राण होते देख उनका हृदय ग्लानि से भर गया। इस मर्मस्पर्शी दृश्य ने उन्हें इतना झकझोरा कि उन्होंने भविष्य में कभी शिकार न करने की प्रतिज्ञा ली और सांसारिक सुखों का परित्याग कर दिया।
विरक्ति के बाद वे साधु-संतों की संगति में रहने लगे और एक बैरागी साधु बन गए। उन्होंने सबसे पहले जानकी दास को अपना गुरु बनाया, उन्होंने उनका नाम बदलकर माधो दास रख दिया। बाद में उन्होंने साधु राम दास और नासिक में योगी औघड़ नाथ से योग और तांत्रिक विद्या सीखी। औघड़ नाथ ने उन्हें रिद्धि-सिद्धियों और मंत्रों के गुप्त भेद सिखाए। अपने गुरु के देहांत के बाद माधो दास नांदेड़ चले गए और गोदावरी नदी के तट पर अपना आश्रम स्थापित किया, जहाँ वे अपनी सिद्धियों के कारण प्रसिद्ध हुए।
II. गुरु गोबिंद सिंह जी से भेंट: दास से शूरवीर तक
सितंबर 1708 में सिखों के दसवें गुरु, श्री गुरु गोबिंद सिंह जी नांदेड़ पहुँचे और माधो दास के आश्रम का दौरा किया। माधो दास ने अपनी तांत्रिक शक्तियों के माध्यम से गुरु जी को डराने और उनकी खाट पलटने का प्रयास किया, लेकिन वह पूरी तरह विफल रहा। गुरु जी के आध्यात्मिक तेज के सम्मुख माधो दास का अहंकार चूर-चूर हो गया और उन्होंने उनके चरणों में गिरकर कहा, “ओ गुरु जी, मैं आपका बंदा (दास) हूँ, मुझे सही मार्ग दिखाएं”।
गुरु जी ने माधो दास को अमृत पान कराकर सिख धर्म में दीक्षित किया और उनका नाम गुरबक्श सिंह रखा, यद्यपि वे इतिहास में ‘बंदा सिंह’ के नाम से विख्यात हुए। गुरु जी ने उन्हें पंजाब में मुगल अत्याचारों के विरुद्ध लड़ने और दमनकारी शासन को समाप्त करने का उत्तरदायित्व सौंपा। विदा करते समय गुरु जी ने उन्हें अपने तरकश से पाँच तीर, एक खंडा (दोधारी तलवार) और एक नगारा प्रदान किया। साथ ही, उन्हें मार्गदर्शक के रूप में पाँच प्रमुख सिखों—भाई बिनोद सिंह, भाई काहन सिंह, भाई बाज सिंह, भाई दया सिंह और भाई राम सिंह—के साथ पंजाब भेजा। गुरु जी ने पंजाब के सिखों के नाम हुक्मनामे (अधिकार पत्र) भी जारी किए, जिसमें उन्हें बंदा सिंह के नेतृत्व में एकजुट होने का आदेश दिया गया।
III. मुगल सत्ता के विरुद्ध सैन्य अभियान: अनवरत युद्धों की श्रृंखला
बंदा सिंह बहादुर का पंजाब आगमन मुगल साम्राज्य के लिए एक भीषण चुनौती सिद्ध हुआ। उन्होंने न केवल छोटे साहिबजादों की हत्या का प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया, बल्कि समूची दमनकारी व्यवस्था को उखाड़ फेंकने का लक्ष्य रखा। उनके प्रमुख युद्ध और विजय निम्नलिखित हैं:
- सोनीपत और कैथल की विजय: पंजाब पहुँचते ही बंदा सिंह ने सोनीपत पर आक्रमण किया और भूना में शाही खजाने पर कब्जा कर लिया, जिससे उनकी सेना को वित्तीय संसाधन प्राप्त हुए। इसके बाद उन्होंने कैथल की ओर रुख किया और मुगल सैन्य टुकड़ियों को पराजित किया।
- समाणा का विध्वंस (नवंबर 1709): समाणा उन मुगल अधिकारियों का गढ़ था जिन्होंने गुरु तेघ बहादुर जी और गुरु गोबिंद सिंह जी के पुत्रों को शहीद किया था। बंदा सिंह की सेना ने जल्लाद जलाल-उद-दीन और साशाल बेग व बाशाल बेग के परिवारों को दंडित किया और शहर पर विजय प्राप्त की। फतेह सिंह को वहां का शासक नियुक्त किया गया।
- सढौरा की विजय: सढौरा का शासक उस्मान खान एक अत्याचारी था, जिसने पीर बुद्धू शाह को गुरु जी की सहायता करने के कारण मार डाला था। बंदा सिंह ने सढौरा पर अधिकार कर लिया। युद्ध के दौरान जिस हवेली में मुस्लिम निवासियों ने शरण ली थी, उसे सिखों ने नष्ट कर दिया, जिसे बाद में ‘कत्ल गढ़ी’ के नाम से जाना गया।
- चप्पड़चिड़ी और सरहिंद की निर्णायक विजय (मई 1710): बंदा सिंह का मुख्य लक्ष्य सरहिंद का सूबेदार वजीर खान था, जो साहिबजादों की हत्या का मुख्य दोषी था। 12 मई 1710 को चप्पड़चिड़ी के मैदान में भीषण युद्ध हुआ। वजीर खान की 20,000 की प्रशिक्षित सेना सिखों के जोश के सामने टिक न सकी। वजीर खान को फतेह सिंह ने युद्ध में मार गिराया और 14 मई को सरहिंद पर खालसा का केसरी निशान फहराया गया।
- विस्तार और अन्य विजय: सरहिंद की जीत के बाद उन्होंने जालंधर दोआब क्षेत्र को मुगल मुक्त कराया। उनकी सेना ने अमृतसर, बटाला, कलानौर और पठानकोट पर कब्जा किया। उन्होंने मुखलिसपुर के किले को अपनी राजधानी बनाया और उसका नाम बदलकर ‘लोहगढ़’ रखा।
IV. प्रशासनिक सुधार और मानवीय गुण: एक लोक-कल्याणकारी शासक
बाबा बंदा सिंह बहादुर केवल एक योद्धा ही नहीं, बल्कि एक प्रगतिशील दूरदर्शी प्रशासक भी थे। उन्होंने निम्नलिखित लोक-कल्याणकारी कार्य किए:
- जमींदारी प्रथा का अंत: उन्होंने सदियों से चली आ रही शोषक जमींदारी प्रथा को समाप्त कर दिया और भूमि का स्वामित्व सीधे उन किसानों को दिया जो उसे जोतते थे। यह मध्यकालीन भारत में एक महान सामाजिक क्रांति थी।
- स्वतंत्र मुद्रा: उन्होंने गुरु नानक देव और गुरु गोबिंद सिंह के नाम पर चांदी के सिक्के और आधिकारिक मुहर जारी की, जो सिख राज्य की संप्रभुता का प्रतीक थीं।
- धार्मिक सहिष्णुता और न्याय: उनके शासन में न्याय सर्वोच्च था। उन्होंने धर्म के आधार पर भेदभाव किए बिना आम जनता को सुरक्षा प्रदान की।
V. घेराबंदी और बलिदान: अद्वितीय शहादत
मुगल सम्राट बहादुर शाह की मृत्यु के बाद सम्राट फर्रुखसियर ने बंदा सिंह को नष्ट करने के लिए अब्दुल समद खान के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी। 1715 में बंदा सिंह और उनके साथियों को गुरदास नंगल के किले में घेर लिया गया। यह घेराबंदी आठ महीने तक चली, जिसमें सिखों ने पेड़ों की छाल और घास खाकर भी संघर्ष जारी रखा। अंतिम 7 दिसंबर 1715 को भूख और संसाधनों की कमी के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
उन्हें और लगभग 700-800 सिखों को जंजीरों में जकड़ कर दिल्ली लाया गया और सड़कों पर अपमानित किया गया। मुगलों ने उन्हें इस्लाम अपनाने पर जीवनदान का प्रस्ताव दिया, लेकिन एक भी सिख ने अपना धर्म नहीं त्यागा और हंसते हुए शहादत दी।
9 जून, 1716 को दिल्ली में बंदा सिंह बहादुर को दी गई यातनाएं रोंगटे खड़े कर देने वाली थीं। उन्हें उनके चार वर्षीय पुत्र अजय सिंह की हत्या करने को कहा गया, और इनकार करने पर जल्लाद ने बच्चे के टुकड़े-टुकड़े कर उसका धड़कता हुआ दिल बंदा सिंह के मुँह में ठूंस दिया। इसके बाद बंदा सिंह की आँखें निकाल दी गई, गर्म चिमटों से उनके शरीर का मांस नोचा गया और उनके हाथ-पैर काट दिए गए। वे अंत तक वाहेगुरु का जाप करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए।
VI. साहित्यिक विरासत: ‘बंदी वीर’ और टैगोर की श्रद्धांजलि
यद्यपि स्रोतों में बंदा सिंह द्वारा रचित कविता का सीधा उल्लेख नहीं है, लेकिन उनकी वीरता विश्व साहित्य का विषय बनी है। नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर ने उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर ‘बंदी वीर’ (The Captive Brave) नामक अमर कविता लिखी। टैगोर ने इस कविता में उस क्षण का चित्रण किया है जब बंदा सिंह और उनके सैनिक दिल्ली की सड़कों पर मौत को ललकार रहे थे:
“हजारों कंठों से ‘गुरुजी की जय’ पुकारते हुए, सुबह सैकड़ों योद्धाओं ने अपने सिर जल्लाद को सौंप दिए”।
टैगोर ने बंदा सिंह की वीरता को सिख आध्यात्मिकता की भौतिक शक्ति पर विजय के रूप में प्रस्तुत किया है।
बाबा बंदा सिंह बहादुर का जीवन अन्याय के विरुद्ध एक महान क्रांति का नाम है। उन्होंने न केवल दमनकारी मुगल सत्ता की नींव हिला दी, बल्कि सिखों के मन में यह विश्वास जगाया कि वे शासक बन सकते हैं। उनके द्वारा स्थापित सिख राज्य की नींव पर ही आगे चलकर महाराजा रणजीत सिंह ने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया। वे इतिहास के उन गिने-चुने नायकों में से हैं, जिन्होंने अपनी शहादत से यह सिद्ध किया कि धर्म और सत्य के लिए सर्वस्व न्योछावर करना ही जीवन की वास्तविक सार्थकता है।