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23 मार्च – शहीदी दिवस – शिवराम हरी राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव थापर

****शहीदी दिवस – शिवराम हरी राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव थापर****

(23 मार्च 1931)

23 March Bhagat Singh Photo Raj Guru Photo Sukhdev Thapar Photo

23 मार्च वर्ष 1931 में महान क्रांतिकारियों भगत सिंह, शिवराम हरी राजगुरु और सुखदेव थापर को ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी की सजा दी। इस दिन को शहीदी दिवस के तौर पर याद किया जाता है। इन क्रांतिकारियों ने संघर्ष के बल पर आजादी दिलाने की ठानी और क्रांति के पर्याय बन कर अमर हो गए। 13 अप्रैल 1919 में हुए जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय भगत सिंह की उम्र 12 साल की थी। 1920 में महात्मा गांधी के आसहयोग आंदोलन से प्रभावित होकर भगत सिंह ने 1921में स्कूल छोड़ कर गांधी जी के आंदोलन में भाग लिया। 

वर्ष 1928 में साइमन कमीशन के विरोध में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में शांतिपूर्ण तरीके से विरोध हुआ। जिसमें अंग्रेज अधीक्षक सांडर्स के आदर्श के पर हुए लाठीचार्ज में लोक प्रसिद्ध क्रांतिकारी लाला लाजपत राय गंभीर रूप में जख्मी हुए और इसी कारण 11 नम्बर 1928 को उनकी मृत्यु हो गई। 

भगत सिंह ने  राजगुरु, सुखदेव, चंद्रशेखर आजाद और जय गोपाल के साथ मिलकर सांडर्स को मारकर लालाजी की मौत का बदला लिया। सांडर्स की हत्या ने भगत सिंह को पूरे देश में एक क्रांतिकारी के रूप में पहचान दिला दी।

8 अप्रैल 1929 के दिन भगत सिंह ने बटुकेश्वर दत्त के साथ मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए सेंट्रल असेंबली में बम फेंका और इंकलाब जिंदाबाद साम्राज्यवाद का नाश हो के नारे लगाए थे। 

भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त पर लाहौर षड्यंत्र के तहत मुकदमा चला बाद में इन पर सांडर्स की हत्या का मुकदमा भी चला। अंग्रेजों ने भगत सिंह और अन्य क्रांतिकारिओं की बढ़ती लोकप्रियता और 24 मार्च को होने वाले संभावित विद्रोह की वजह से 23 मार्च 1931 को ही भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को फांसी दे दी। क्रांति के सर्वोच्च शिखर पर पहुंचकर यह महान क्रांतिकारी आजादी के लिए हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूम कर अमर हो गए।  

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